Thursday, August 28, 2014

आजकल के बच्चे

आजकल के बच्चे

थोड़े नादान थोड़े अनजान, थोड़े सँभलते थोड़े फिसलते
समय की भट्टी में जलते, संस्कारों से कुंदन से दमकते||

अच्छी पढाई का बोझ लिए घर से निकलते
दुनियादारी की आंधी में खुद से संभलते||

घर का सुख नही माँ का लाड नही
बचपन की मस्ती नही, जीवन का आनंद नही||

यूँ ही तो नही तकदीर अपनी बदलते
समय के साथ समय से आगे है चलते ||

कुछ पाने के लिए कितना कुछ खो देते है
माँ की गोद मिले तो बिना बात रो देते है||

कैसा जमाना आया है अंधी दौड़ जारी है
हर कोई एक दुसरे पर बन रहा भारी है||





2 comments:

"नेह्दूत" said...

वहुत खूव ..
सुंदर रचना

Unknown said...

शुक्रिया नेह्दूत